सैयद सालार मसूद गाजी और बहराइच: क्या है उनका रिस्ता गाजी सरकार 500

  • बहराइच: सैयद सालार मसूद गाजी 11वीं सदी के गजनवी सैन्य कमांडर थे, जिनका जन्म 1014 में अजमेर में हुआ और 1034 में बहराइच में मृत्यु हुई।
  • बहराइच में उनकी दरगाह हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल है।
  • वार्षिक उर्स मेला, विशेष रूप से जेठ मेला, हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।
  • उनकी छवि को लेकर हाल के वर्षों में विवाद उत्पन्न हुआ है, कुछ उन्हें आक्रमणकारी मानते हैं, जबकि अन्य सूफी संत के रूप में पूजते हैं।
  • यह विषय संवेदनशील है, और सभी दृष्टिकोणों का सम्मान करना महत्वपूर्ण है।

सैयद सालार मसूद गाजी, जिन्हें गाजी मियां भी बाले है।

सैयद सालार मसूद गाजी, जिन्हें गाजी मियां या बाले मियां के नाम से भी जाना जाता है, 11वीं सदी के एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं, जिनका संबंध उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से है।

वे गजनवी साम्राज्य के सैन्य कमांडर थे और 1034 में बहराइच की लड़ाई में राजा सुहेलदेव के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए। उनकी दरगाह बहराइच में एक प्रमुख तीर्थस्थल है, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र है।

यहाँ हर साल आयोजित होने वाला उर्स मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। हालांकि, हाल के वर्षों में उनकी छवि को लेकर कुछ विवाद सामने आए हैं, जो इस ऐतिहासिक व्यक्तित्व की जटिल विरासत को दर्शाते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सैयद सालार मसूद गाजी का जन्म 10 फरवरी 1014 को अजमेर, राजस्थान में हुआ था। वे महमूद गजनवी के भतीजे थे, क्योंकि उनकी माता महमूद की बहन थीं। उनके पिता, सालार साहू, गजनवी सेना में सेनापति थे। गाजी ने 16 वर्ष की आयु में भारत पर आक्रमण शुरू किया, मुल्तान पर विजय प्राप्त की, और बाद में दिल्ली, मेरठ, और कन्नौज जैसे क्षेत्रों में अभियान चलाए।

15 जून 1034 को, बहराइच में चित्तौरा झील के किनारे, उन्होंने राजा सुहेलदेव के खिलाफ युद्ध लड़ा। इस लड़ाई में गाजी घायल हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें बहराइच में दफनाया गया, जहाँ उनकी दरगाह स्थापित की गई। उनकी जीवनी का मुख्य स्रोत “मिरात-ए-मसूदी” है, जो 17वीं सदी में अब्दुर रहमान चिश्ती द्वारा लिखी गई एक फारसी हागियोग्राफी है। इस ग्रंथ में उन्हें योद्धा-संत के रूप में चित्रित किया गया है।

बहराइच में सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह

बहराइच में सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह उनकी समाधि पर स्थित है और यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है।

इसका निर्माण 1250 में नसीरुद्दीन महमूद ने करवाया था। बाद में, इसे कई शासकों ने दौरा किया और इसका विकास किया, जिनमें मुहम्मद बिन तुगलक (1341), फिरोज शाह तुगलक (1372), और सम्राट अकबर (1561 और 1571) शामिल हैं।

दरगाह हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए पवित्र है। यहाँ के अनुष्ठानों में हिंदू प्रभाव स्पष्ट है, और 2000 के दशक में, वार्षिक मेले में अधिकांश आगंतुक हिंदू थे। श्रद्धालु मानते हैं कि दरगाह के पानी में स्नान करने से त्वचा रोग ठीक हो सकते हैं, जिसके कारण यहाँ भक्तों की भीड़ रहती है।

वार्षिक उर्स मेला जेठ मेला, जो जेठ महीने (मई-जून)

जेठ मेला, जो जेठ महीने (मई-जून) के पहले रविवार से शुरू होता है, दरगाह पर एक महीने तक चलने वाला उत्सव है। यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है और लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 2024 में, मेले के पहले दिन लगभग 8 लाख तीर्थयात्री शामिल हुए।

  • अनूठी परंपरा: मेले की सबसे खास परंपरा है “बिन दूल्हे की बारात”, जिसमें भारत भर से लगभग 500 बारातें रात में दरगाह पर पहुँचती हैं। यह परंपरा 800 वर्ष पुरानी है और जोहरा बीबी से शुरू हुई, जिन्होंने दरगाह की यात्रा के बाद अपनी दृष्टि पुनः प्राप्त की।
  • चढ़ावा: भक्त सफा (पगड़ी), शेरवानी, पलंग पीढ़ी (स्टूल), और मुकुट जैसी वस्तुएँ दहेज के रूप में चढ़ाते हैं। सबसे सुंदर बारात तदा से आती है।
  • सुरक्षा और प्रबंधन: मेले में सुरक्षा के लिए पुलिस चौकियाँ, CCTV कैमरे, और छिपे सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं। इसका प्रबंधन शमसाद अहमद और अलीमुल हक जैसे आयोजकों द्वारा किया जाता है।

मेले का उद्घाटन 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच के दो जजों, जस्टिस फैज आलम खान और जस्टिस शमीम अहमद द्वारा किया गया।

विवाद और आधुनिक दृष्टिकोण

हाल के वर्षों में, सैयद सालार मसूद गाजी की छवि को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है। कुछ समूह उन्हें एक आक्रमणकारी के रूप में देखते हैं, जो सोमनाथ मंदिर की लूट में शामिल थे, जबकि अन्य उन्हें 12वीं सदी के सूफी संत के रूप में पूजते हैं।

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उछाला गया, जिससे बहराइच, बाराबंकी, और अन्य जिलों में नेजा मेले की अनुमति पर विवाद हुआ।

एसपी एमपी जियाउर्रहमान बर्क ने कहा कि सोमनाथ हमले के समय गाजी केवल 11 वर्ष के थे, और इस आरोप का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। फिर भी, पुलिस के बयानों, जैसे एडिशनल एसपी श्रीश चंद्र के “किसी लूटेरे की याद में मेला नहीं होगा,” ने तनाव बढ़ाया।

इसके बावजूद, दरगाह और उर्स मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बने हुए हैं, और यहाँ दोनों समुदाय मिलकर प्रार्थना करते हैं और उत्सव मनाते

बहराइच: सैयद सालार मसूद गाजी कौन है

सैयद सालार मसूद गाजी, जिन्हें गाजी मियां, बाले मियां, या बड़े मियां के नाम से भी जाना जाता है, 11वीं सदी के एक सैन्य कमांडर और ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। उनका नाम उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से गहराई से जुड़ा है, जहाँ उनकी दरगाह एक प्रमुख तीर्थस्थल है।

वे गजनवी साम्राज्य के अभियानों में शामिल थे और 1034 में बहराइच की लड़ाई में राजा सुहेलदेव के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए। उनकी दरगाह हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र है, और यहाँ का वार्षिक उर्स मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

हाल के वर्षों में, उनकी छवि को लेकर विवाद भी सामने आए हैं, जो इस ऐतिहासिक व्यक्तित्व की जटिल विरासत को दर्शाते हैं। यह लेख उनके जीवन, दरगाह, मेले, और समकालीन विवादों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सैयद सालार मसूद गाजी का जन्म 10 फरवरी 1014 को अजमेर, राजस्थान में हुआ था। वे महमूद गजनवी के भतीजे थे, क्योंकि उनकी माता महमूद की बहन थीं। उनके पिता, सालार साहू, गजनवी सेना में सेनापति थे। गाजी ने 16 वर्ष की आयु में सैन्य अभियान शुरू किए, जिसमें उन्होंने सिंधु नदी पार कर मुल्तान पर विजय प्राप्त की। इसके बाद, उन्होंने दिल्ली, मेरठ, और कन्नौज जैसे क्षेत्रों में अभियान चलाए।

15 जून 1034 को, बहराइच में चित्तौरा झील के किनारे, गाजी ने राजा सुहेलदेव के खिलाफ युद्ध लड़ा। इस लड़ाई में वे घायल हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें बहराइच में दफनाया गया, जहाँ उनकी दरगाह स्थापित की गई। उनकी जीवनी का मुख्य स्रोत “मिरात-ए-मसूदी” है, जो 17वीं सदी में अब्दुर रहमान चिश्ती द्वारा लिखी गई। इस ग्रंथ में उन्हें योद्धा-संत के रूप में चित्रित किया गया है।

पहलूविवरण
जन्म10 फरवरी 1014, अजमेर, राजस्थान
माता-पितापिता: सालार साहू; माता: महमूद गजनवी की बहन
सैन्य अभियानमुल्तान, दिल्ली, मेरठ, कन्नौज पर विजय
मृत्यु15 जून 1034, बहराइच की लड़ाई में राजा सुहेलदेव के खिलाफ युद्ध में
प्रमुख स्रोतमिरात-ए-मसूदी, 17वीं सदी की फारसी हागियोग्राफी

बहराइच में दरगाह

सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह बहराइच में उनकी समाधि पर स्थित है और यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। इसका निर्माण 1250 में नसीरुद्दीन महमूद ने करवाया था। बाद में, इसे कई शासकों ने दौरा किया और इसका विकास किया, जिनमें शामिल हैं:

  • मुहम्मद बिन तुगलक और इब्न बतूता (1341): दरगाह का दौरा किया।
  • फिरोज शाह तुगलक (1372): दरगाह का और विकास किया।
  • सम्राट अकबर (1561 और 1571): दरगाह को अनुदान दिया और इसका दौरा किया।

दरगाह हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए पवित्र है। यहाँ के अनुष्ठानों में हिंदू प्रभाव स्पष्ट है, जैसे चढ़ावे और बारात की परंपराएँ। 19वीं सदी में, ब्रिटिश प्रशासक विलियम हेनरी स्लीमैन ने हिंदू भक्ति पर आश्चर्य व्यक्त किया, क्योंकि गाजी को ऐतिहासिक रूप से एक सैन्य आक्रमणकारी के रूप में देखा जाता था। फिर भी, 2000 के दशक में, वार्षिक मेले में अधिकांश आगंतुक हिंदू थे।

श्रद्धालु मानते हैं कि दरगाह के पानी में स्नान करने से त्वचा रोग ठीक हो सकते हैं, जिसके कारण यहाँ भक्तों की भीड़ रहती है।

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वार्षिक उर्स मेला

जेठ मेला, जो जेठ महीने (मई-जून) के पहले रविवार से शुरू होता है, दरगाह पर एक महीने तक चलने वाला उत्सव है। यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है और भारत और विदेश से लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 2024 में, मेले के पहले दिन लगभग 8 लाख तीर्थयात्री शामिल हुए।

  • अनूठी परंपरा: मेले की सबसे खास परंपरा है “बिन दूल्हे की बारात”, जिसमें भारत भर से लगभग 500 बारातें रात में दरगाह पर पहुँचती हैं। यह परंपरा 800 वर्ष पुरानी है और जोहरा बीबी से शुरू हुई, जिन्होंने दरगाह की यात्रा के बाद अपनी दृष्टि पुनः प्राप्त की।
  • चढ़ावा: भक्त सफा, शेरवानी, पलंग पीढ़ी, और मुकुट जैसी वस्तुएँ दहेज के रूप में चढ़ाते हैं। सबसे सुंदर बारात तदा से आती है।
  • सुरक्षा और प्रबंधन: मेले में सुरक्षा के लिए पुलिस चौकियाँ, CCTV कैमरे, और छिपे सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं। इसका प्रबंधन शमसाद अहमद और अलीमुल हक जैसे आयोजकों द्वारा किया जाता है।
  • उद्घाटन: 2024 में, मेले का उद्घाटन इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच के दो जजों, जस्टिस फैज आलम खान और जस्टिस शमीम अहमद द्वारा किया गया।

श्रद्धालु 7 किलोमीटर की पैदल यात्रा गर्मी में करते हैं, मزار पर चढ़ावा चढ़ाते हैं, और पूरे महीने प्रार्थनाएँ और मन्नतें माँगते हैं।

विवाद और आधुनिक दृष्टिकोण

हाल के वर्षों में, सैयद सालार मसूद गाजी की छवि को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है। कुछ समूह उन्हें एक आक्रमणकारी के रूप में देखते हैं, जो सोमनाथ मंदिर की लूट में शामिल थे, जबकि अन्य उन्हें 12वीं सदी के सूफी संत के रूप में पूजते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उछाला गया, जिससे बहराइच, बाराबंकी, अमरोहा, भदोही, और मुरादाबाद में नेजा मेले की अनुमति पर विवाद हुआ।

  • आरोप: कुछ लोग गाजी को सोमनाथ मंदिर की लूट से जोड़ते हैं, लेकिन एसपी एमपी जियाउर्रहमान बर्क ने कहा कि उस समय गाजी केवल 11 वर्ष के थे, और इस आरोप का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
  • पुलिस बयान: एडिशनल एसपी श्रीश चंद्र के बयान, “किसी लूटेरे की याद में मेला नहीं होगा,” ने तनाव बढ़ाया।
  • राजनीतिक संदर्भ: 2024 के चुनावों में, भाजपा ने हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए इस मुद्दे का उपयोग किया, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ा।

इसके बावजूद, दरगाह और उर्स मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बने हुए हैं। दोनों समुदाय यहाँ मिलकर प्रार्थना करते हैं और उत्सव मनाते हैं, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है।

तुलनात्मक विश्लेषण

निम्न तालिका सैयद सालार मसूद गाजी के ऐतिहासिक और समकालीन दृष्टिकोणों की तुलना करती है:

पहलूऐतिहासिक दृष्टिकोणसमकालीन दृष्टिकोण
भूमिकागजनवी अभियानों में सैन्य कमांडर, युद्ध में मृत्युकुछ के लिए आक्रमणकारी, अन्य के लिए सूफी संत
धार्मिक महत्वयोद्धा-संत, सभी धर्मों के लिए दरगाहएकता का प्रतीक, लेकिन विवादों का केंद्र
राजनीतिक संदर्भअकबर, तुगलक जैसे शासकों द्वारा दौरा2024 में वोट एकीकरण के लिए राजनीतिक उपयोग
वार्षिक आयोजनहिंदू-मुस्लिम भागीदारी वाला उर्स मेलानेजा मेला विवादित, सुरक्षा और राजनीतिक तनाव
साक्ष्यमिरात-ए-मसूदी, ऐतिहासिक लेखसोमनाथ के लिए साक्ष्य की कमी, चल रही बहस

सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव

सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह हिंदू-मुस्लिम एकता का एक शक्तिशाली प्रतीक है। यहाँ दोनों समुदाय एक साथ प्रार्थना करते हैं और उत्सव मनाते हैं, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है। मेले में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की भागीदारी इसकी समावेशी प्रकृति को दर्शाती है। हाल के राजनीतिक विवादों ने इस एकता को चुनौती दी है, लेकिन दरगाह का महत्व बना हुआ है। यह स्थल भारत की धर्मनिरपेक्ष और सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो विभिन्न समुदायों को एक मंच पर लाता है।

People also ask(FAQ)

गाजी बाबा की मजार कहाँ स्थित है?

 बहराइच (Bahraich), उत्तर प्रदेश में स्थित है

गाजी बाबा का मेला कब है?

बहराइच में हर साल जेठ महीने (मई-जून) में

बहराइच दरगाह शरीफ का इतिहास क्या है?

सैयद सालार मसूद गाजी से जुड़ा है, जो 11वीं शताब्दी में एक प्रसिद्ध इस्लामी संत और सैनिक थे।

सैयद सालार मसूद गाजी का उर्स कब है?

हर साल जेठ माह में यहां एक माह का उर्स लगता है

निष्कर्ष

सैयद सालार मसूद गाजी और बहराइच का उनका संबंध इतिहास, संस्कृति, और आधुनिक राजनीति का एक जटिल मिश्रण है। उनकी दरगाह न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी है। हाल के विवादों के बावजूद, यह स्थल और इसका वार्षिक उर्स मेला भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को मजबूत करता है। सभी पक्षों के प्रति संवेदनशीलता और ऐतिहासिक तथ्यों की सटीक समझ इस विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण होगी।

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